कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 4205

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तुमने कभी द्वार नहीं खोले

तुमने कभी द्वार नहीं खोले मैंने कभी दस्तक नहीं छोड़ी दो प्रेम में बंद लोग कविताबद्ध रहे अप्रेम पत्र रचते रहे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें