कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 4167

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परछाई कभी छोड़ कर नहीं जाती

परछाई कभी छोड़ कर नहीं जाती... इससे ज़्यादा हक़ क्या दूँ तुझे? *एक ही अधूरी कहानी रोज़ रोज़ लिखने लगो तो समझो प्रीत हुई।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें