कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 4141

भाषा / Language

जिगर में इक तड़पता सा सवाल उभरा है

जिगर में इक तड़पता सा सवाल उभरा है ...... क्या वाक़ई इश्क अंधा है या मेरे लिए ही बहरा हुआ है ? क्या ये वही बुलबुला है जो बरसों से मुझमें ठहरा हुआ है ? पहले इक लकीर थी हाथों की अब क्यों यादों का जखीरा हुआ है ? मेरे वजूद का मलहम सा था कभी ऐसे कैसे ये जख्म गहरा हुआ है ? तेरी मौजूदगी ओढ़ते थे रात भर कौन सपने लूट कर सवेरा हुआ है ? अपने नहीं ,तेरे नूर से सजते थे क्या ये वही चेहरा बेज़ार हुआ है ? बादशाहत थी इश्क के खेल में मेरी जाने कैसे बेरब्त हर मोहरा हुआ है ? उफ्फ रात, सुरमई शामें ,उजले दिन ऐसा क्यों हर तरफ कोहरा हुआ है ? शायद ..... वो बदल गया है शायद ..... वो छल गया है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें