कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 4119

भाषा / Language

जब तक वो समझ आने लगता है उसके लौटने का वक्त हो जाता है

जब तक वो समझ आने लगता है उसके लौटने का वक्त हो जाता है ... मुझे प्रेम के बारे में बस इतना इल्म है कि ये दिल लगाने की नहीं दिल रखने भर की बात है। दिल भी उतना भर रखना जितना उसको भार न लगे।चाहे आप कितने भी भरे हों। भर जाना मेरे लिए क्या है? शायद मेरा समर्पण .... जी भर लिख लेना तुमको। तुम्हारे लिए क्या है? शायद लौट जाना। मेरे हिस्से के प्रेम को लेकर... अर्जियों के मौसम में दरकार की वादियों में चुप्पी के दरख़्त पर। *जिस रिश्ते में आप हो पर लगता है नहीं हो....वही मन का रिश्ता है ना होना ही तो होना है ना?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें