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रचना 4108

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एक चिड़िया थी ।एक रोज़ वो एक खिड़की के प्रेम में पड़ गयी।

एक चिड़िया थी ।एक रोज़ वो एक खिड़की के प्रेम में पड़ गयी। दूर दूसरे शहर की वह खिड़की ही उसके पास एक पता थी। जब पहली बार उसने उस खिड़की को देखा तो सोचने लगी ये बंद इतनी खूबसूरत है तो खुलकर कितनी दिलकश होगी। चिड़िया को उस खिड़की पर रोज़ एक टुकड़ा कागज़ धरा मिलता जिस पर कुछ - कुछ लिखा रहता। चिड़िया रोज़ उन कागज़ के टुकड़ों को पढ़ती और डूब जाती। धीरे - धीरे चिड़िया को लत लग गयी। खिड़की से ज्यादा उन कागजों में छिपे शब्दों की लत। चिड़िया रोज़ अपने पंखों में खिड़की की चाहना भर लेती और उस तक पहुंच जाती। चिड़िया क्योंकि बहुत चहकती थी तो वो खिड़की के पास सटकर उन कागज़ के टुकड़ों से अपने सुख दुख कहने लगी।जो मन आये .... हर खुशी ...हर दुख । एक रोज़ चिड़िया ने कागज़ से कहा ...मैं इस खिड़की के प्रेम में पड़ गयी हूँ।क्या मैं सही हूँ? कागज़ ने बस एक हल्की मुस्कान देकर बात दबा दी। चिड़िया ये मान कर चलने लगी कि खिड़की के पीछे कोई उसे सुन रहा है।तभी उसकी आवाज़ लौटती नहीं। कोई उसे accept कर रहा है। ये उसका भरम था या विश्वास पता नहीं। जब खिड़की से प्रेम बढ़ा तो चिड़िया की चाहना बढ़ने लगी। उसे इच्छा हुई कि किसी रोज़ खिड़की गर खुल गयी तो वो उस पार उस अजनबी को क्या कहेगी? इसके अलावा कि.... तुम एक सुंदर खिड़की के मालिक हो। तुम्हारे शब्दों का जादू मुझे प्रेमिल रखता है। या सिर्फ़ ये कि.... इतने बरसों में तुम्हारी आदी हो गयी हूँ.... अब आदि नहीं हो पाओगे तुम मुझसे। मेरे पंख इतनी ही उड़ान भर सकते हैं बस तुम्हारी इस खिड़की तक।उसके बाद वो स्थिर हो जाते हैं। खिड़की चिड़िया की इन बातों से हैरत में पड़ी रहती कि ये कैसी सी चिड़िया है ...पूरा जहां छोड़कर मेरे मुंडेर में पड़ी रहती है। इसकी आँखें थकती नहीं।इसकी मुस्कान छूट ती नहीं ।इसके होंठ कभी सूखते नहीं ।इसके पंख कभी नम नहीं पड़ते ।इसकी बोली में कोई शिकन नहीं रहती। साल दर साल इसका मुझ तक आना और यही पड़े रहना ।काठ की खिड़की से इक रोज़ जलते मोम की खुश्बू आने लगी। एक रोज़ खिड़की चिड़िया के आते ही खुल गयी। चिड़िया अपनी सारी थकान भूल कर खिड़की को देखती ही रह गयी । हर रोज़ मिलने वाला पन्ना अभी ख़ाली ही पड़ा था। चिड़िया ने सारा प्रेम उस पन्ने पर उसी वक़्त उड़ेल दिया। खिड़की ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और चिड़िया ने प्रेम का। मगन चिड़िया ने कभी ये जानना नहीं चाहा कि उसके प्रेम का जवाब कभी मिलेगा या नहीं। बंजारन सी.... किसी रोज़ चिड़िया को खिड़की खुली मिलती किसी रोज़ बंद। चिड़िया नादान अपने में डूबी रहती। आने - जाने खुलने- बंद रहने के कारोबार में चिड़िया और खिड़की जाने कितनी बार अजनबी, कितने बार दोस्त ,कितने बार प्रेमी और जाने कितने बार ..... कुछ नहीं भी होते रहे। चिड़िया ने ये मान लिया कि अब यही दर भी है, दरख्वास्त भी ,दायरा भी और दैर -ओ -हरम भी। किसी किसी रोज़ चिड़िया आवाज़ न देती ।तो भी खिड़की यही मानती कि वो मेरे लिए ही मौन है। किसी किसी रोज़ खिड़की न खुलती तो चिड़िया जान जाती कि आज उस तरफ़ ख़ामोशी की नज़्म लिखी जा रही। बिन शिकायत वाला रिश्ता। एक रोज़ चिड़िया ने प्रेम में अपने पंखों से बंद खिड़की पर खरोंचे मार दी।उसे खोलने की कोशिश की । खिड़की खुली और उसी समय चिड़िया के मुँह पर बंद हो गयी ।चिड़िया के पंख और आत्मा दोनों दब गए। चिड़िया ने बिना कुछ कहे उस रोज वाला कागज़ का टुकड़ा उठाया और चली गयी... अगली कई दस्तकों को नकार कर। कागज़ ने पूछा.... उदास हो..? अब क्या करोगी चिड़िया ? उससे थोड़ा प्रेम और करूँगी और क्या करूँगी.... कागज़ सोच में पड़ गया.....काश मैं खिड़की होता अभी इसी वक्त। काश मैं उसके पंखों को चूम सकता। काश मैं उसकी आत्मा को ढँक लेता। काश मैं अभी इसी वक्त उसे बाँहों में भर कर कहता चिड़िया तुम मेरी बन जाओ ना।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें