कल्पनाशब्दों के बीच
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मैंने तुम्हें इस लिए नहीं याद रखा कि तुमने एक रोज़ मेरा मन…

मैंने तुम्हें इस लिए नहीं याद रखा कि तुमने एक रोज़ मेरा मन तोड़ दिया... मेरी चाहना के टुकड़े हो गए। तुम इस लिए यादगार हो गए कि तुमने मुझे अपनी ही किरचियां उठाने में मदद की ।अपने आईने में पड़ गई दरार पर लेप लगाना सिखाया । बताया कि मैं क्या हूं और अब तक क्या क्या हो सकती थी। तुमने मुझे रद्द कर समुंद्र में धकेल दिया कि क्षितिज उस पार है... तुम मोती क्यों ढूंढती हो? अक्सर तुमने मुझे हवा में घोलते हुए कहा प्रेम मुझमें नहीं तुम खुद हो। गंध मेरी नहीं ....तुम खुद कस्तूरी हो । मुझे नहीं ...खुद को ढूंढो एक तुम्हारी *ना* ने मुझे कितना भर दिया है खुद से। उस रोज़ भी गिरते हुए मुझे कभी नहीं लगा कि मैं ऊंचाई से गिर रहीं हूं... मुझे महसूस हुए तुम्हारे दिए हुए दो अदृश्य पंख जो मुझे सम्मोहन से बाहर ले आए। कल्पना को कल्पना से निकाल कर तुमने एक नई कल्पना गढ़ दी। अब जब मैं अपने पास बहुत अधिक हूं.... खुश हूं । तुमको याद में शुक्रिया कहती हूं। अब तुम मेरे पास उससे भी कहीं अधिक हो गए हो। आसपास नहीं.. मुझमें भीतर कहीं। मेरे ओज में ... मेरी मुस्कान में ... मेरे स्पर्श में ... मेरे सुकून में तुम मेरे लिए याद गार हो गए हो। प्रार्थना में शामिल हो जैसे। प्रेम परिचय करवाता है ....तुमने मुझे मेरा ही परिचय करवाया..... रहना तुम।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें