भाषा / Language
साल भर में 365 दिन थे
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साल भर में 365 दिन थे...
मैं कितनी भर रही होगी?
जिंदगी ने उंगलियों पर हिसाब लगाते हुए पूछा
उतनी भर जितनी भर मैं उसको याद आई और वो मुझे याद आये....
मैंने ज़िंदगी के गाल पर बोसा धर कर कहा।
धत्त ! हट परे। फिर तूने सब हिसाब भुला दिया ...
जिंदगी गाल पोंछते पोंछते हुए बोली
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें