कल्पनाशब्दों के बीच
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उसको देखती हूं तो पंख उग आते हैं।

उसको देखती हूं तो पंख उग आते हैं। क्षितिज छू आती हूं ... इक चेहरा मेरा नीला आकाश हो जाता है। *तुमको देखते हुए कोई मुझे देखे तो मैं पाखी दिखूंगी। बस प्रेम पगी आँखें मुझ सी हों।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें