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रचना 4036

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रिश्तों को तो रोज़ .....ढोता है आदमी

रिश्तों को तो रोज़ .....ढोता है आदमी फिर क्यों बिछड़कर ....रोता है आदमी दिन भर सपने ..... कौड़ियों में बेचता रात फिर इक ख्वाब ..बोता है आदमी चाँद पाकर भी ... उस अर्श को ताकता ऐसा भी गरीब .....क्यों होता है आदमी मायूसी की चादर ...हौसले का बिछौना ओढ़ माँ की दुआ ....फिर सोता है आदमी रात की चाह में ......सूरज को निगलता सब्र चुटकियों में ......यूँ खोता है आदमी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें