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एक रोज़ मुझमें प्रेम का बीज पड़ गया

एक रोज़ मुझमें प्रेम का बीज पड़ गया ... मैं आश्वस्त हो गई कि जानती थी कि अब इंतज़ार की बारी है । मुझे बरतना होगा। *इंतज़ार एक कला है ....चुपके चुपके हंसने फिर रोने और फिर हँस देने की। वहीं अधीर हो जाने से प्रतीक्षा आकुल और व्याकुल के बीच कसमसाने लगती है। मैंने इंतज़ार को अधीर होने से अक्सर बचाया। इसी छांव में तुम्हारा प्रेम बीज अब हरियल नज़र आता है। कम लेकिन जरूरत होना चाहा..... ज्यादा लेकिन मामूली होना नकार दिया। मैं इंतज़ार करने और अधीर हो उठने का बारीक अंतर सीख गई। तुमने सिखाया। तुमने कहा.... किसी दिन जैसा दिन नहीं होता। कोई प्रेम दूसरे जैसा नहीं होता। जो है ...वही है। हमेशा रहेगा। *तुम्हें याद करने की लत में लिखने लगी हूं या फिर तुम्हें लिखने की लत में याद करने लगी हूं.... क्या फ़र्क पड़ता है। दरकिनार रखो ऐसी बातों को
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें