कल्पनाशब्दों के बीच
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आज कुछ अतरंगी करने का मन था

आज कुछ अतरंगी करने का मन था... कुछ लिखा ... unedited उसी को पढ़ दिया है। मुझे खूब मज़ा आया। पहली बार ऐसा कुछ करना... बस शाम गुलजार करने की कोशिश थी। खूब त्रुटियां की हैं...कोई नहीं संभाल के क्या गिरना गिरके संभलते हैं। Please don't judge. It's just me... The real me. बहुत शुक्रिया *कहानी अगर आगे लिखी तो शेयर करूंगी। आज इतना ही सही।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें