कल्पनाशब्दों के बीच
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जब भी मन उदास होता है

जब भी मन उदास होता है तुम झर झर गिरने लगते हो आस पास निश्छल भावनाएं अंजुरी में भर कर मंद मंद मुस्कुराते हुए ऐसे चले आते हो मुझ तक कि लगता है इक सरिता बह रही है हमारे बीच मैं न चाहते हुए भी चल देती हूँ तुम्हारी ठानी हुई दिशा की ओर निशब्द सी .... ऐसे की जैसे टोना कर दिया हो तुमने ऐसे कि जैसे मैं थी ही नहीं कभी उदास मेरी उदासी भी उदास रहती है मुझसे मुंह फेर कर कहती है... हर बार बह जाती हो उसके नेह से उसके स्पर्श से तुमसे प्रीत क्या करनी कल्पना?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें