कल्पनाशब्दों के बीच
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स्त्री अपने मन के पुल कभी लौटने वाले नहीं पिरोती।

स्त्री अपने मन के पुल कभी लौटने वाले नहीं पिरोती। तुम समा रहे हो मुझमें शून्य हो रही हूं मैं * उजाले और मैं अभी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें