कल्पनाशब्दों के बीच
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जिस रोज़ फड़फड़ाने की पीड़ा को समझोगे उस रोज़ खुद को क्षमा…

जिस रोज़ फड़फड़ाने की पीड़ा को समझोगे उस रोज़ खुद को क्षमा नहीं कर पाओगे। एक पल सहलाकर पंख नोचना पाप है ....चाहे कितना भी अप्रेम हो। आप इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हो। खेल गिट्टियों का खेलना चाहिए । दिल को उछालना लपकना बुरी बात है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें