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हम अपने लिए क्या ढूंढें

हम अपने लिए क्या ढूंढें? दरख़्त इसलिए भी दरख़्त रहता है कि उसने खुद में ज्यादा पत्तियां ,उससे कम शाखाएं और सबसे कम जड़ों को रखा। पत्तियों की इस बात पर वो हमेशा हैरान परेशान रहा कि ये सुंदर तो हैं पर जाने क्यों रंग बदल देती हैं ? मौसम इन पर असर कर जाता है । ये साथ देते देते एक दिन थक क्यों जाती हैं? ठीक वैसे ही जैसे हमारे आसपास रोज़ाना वाले चेहरे । जो मानी तो रखते है पर किसी भी पल बेमानी हो जाते हैं।बदलते रंग एक फीकापन एक ठूंठ तैयार रखते हैं। इन ढ़ेर सारी पत्तियों का बोझ कुछ कम पर ताकतवर भुजाएं अपने ऊपर लेती हैं ।पेड़ इन्हें प्यार से शाखा बुलाता है और हम रिश्ते। शाखा जब टूटती है तो दरख़्त अपने एक बड़े खूबसूरत हिस्से को खो देता है ।टूटे रिश्तों को कोई नहीं भर पाता ।दरख़्त भी अपनी शाखा की याद में कई दिनों तक सुन्न हो लेता है। रिश्ते शांत हो जाते हैं। एक बीज और उससे निकले कुछ रेशे। फिर जो उससे उपजा मायाजाल बस उन्हीं में रम गया दरख़्त ।जड़ हो गया हो जैसे । सबसे कम पर स्थिर। ऐसे की जैसे हमारा प्रेम ।हमारा फ़ख़्र। जुड़ा हुआ ,गुँथा हुआ, छिपा हुआ पर अडिग। हम अपने लिए पत्ती , शाख या जड़ क्या ढूंढें? हममें कितनी पत्तियां ,कितनी शाखाएं और कितनी जड़ अभी शेष बाक़ी हैं और हम उनको खुद में बनाये रखने के लिए क्या क्या कर रहे हैं ? और क्या क्या नहीं कर रहे? हम खुद कितनों की पत्तियां ,कितनों की शाख और कितनों की जड़ हैं? हम खुद के लिए क्या हैं -पत्ती, शाख,या जड़? हैं भी या ढोंग कर रहे? पत्ती ,शाख और जड़ को आरोही क्रम में और घटते क्रम में रखने और संजोए रखना हमें हरा रखेगा। ये गणित के सवाल जैसा है कठिन...पर असल में ज़िन्दगी का हल है और लभ्य भी। ये पत्तियां, चुनिंदा शाखाएं बस एक जड़ अलभ्य नहीं हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें