कल्पनाशब्दों के बीच
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बंद अधरों और रुके कदमों से प्रेम तुम तक पहुंचता कैसे है ? म…

बंद अधरों और रुके कदमों से प्रेम तुम तक पहुंचता कैसे है ? मैंने उससे पूछा तुम सांस हो कल्पना.... जिस्म को लग गई हो। मैंने ही सुना। कहा थोड़े ही किसी ने।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें