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ये बात मुझ में बबूल बो देती है कि लोग एक रोज़ जिस शिद्दत से…

ये बात मुझ में बबूल बो देती है कि लोग एक रोज़ जिस शिद्दत से ठोकर मारते हैं उससे दुगनी शिद्दत से उसी इंसान को चूम कर सर पर बिठा लेते हैं । ये मुझे ठीक वैसे ही लगता है कि किसी रोज़ किसी को चाहा ,चूमा और ठोकर मार दी। मेरे लिए दोनों में कोई अंतर नहीं। आप किसी को एक बार निरस्त करने के बाद आश्वस्त कैसे कर सकते हैं?मेरा तो मन अगर किसी के लिए बंद हो जाए तो लाख प्रयास कर लूं मुझे उस चेहरे से पहले वो गठान दिखती है जो पड़ गई।मैं रेशे की सलवटें तो माफ कर भी दूं पर मन पर पड़े थक्के और उड़े रंग भूल नहीं पाती। एक अदृश्य दीवार अपने आप बन जाती है। सामने हो ऐसा तो मैं मुस्कुरा तो दूंगी पर खुद तक wavelength आने नहीं देती। आश्वस्त करने के बाद निरस्त करना एक आम बात है। ये आपकी आर्द्रता और संस्कार की बातें हैं। वक्त आपसे कुछ भी करवा सकता है । पर यहां भी मेरा अलग हिसाब किताब है।पहले तो मन पर कोई उभरता नहीं और अगर वो एक बार धंस गया तो फिर वो उतरता नहीं। लाख कोशिशों के बावजूद ,हर मायूसी,हर उदासी,हर इग्नोरेंस को सह जाती हूं पर जिसको चाहा उसको गलत कह ही नहीं सकती। वो मेरा अपना हो गया। I can't question my own choice. दुनिया लोगों से नहीं एक आध अच्छे लोगों से चल जाती है। उनके प्रेम में पड़ी रहूंगी। आप लोटा कैसे हो सकते हो? चाहो ,दुत्कारो.... फिर चाहो कभी नकारो... फिर उसे ही डकारो आसपास ऐसा देखती हूं तो लगता है हद ही है। दुनिया जरूरत के समय 360 डिग्री घूम जाती है। आप खुद को निरस्त कैसे कर सकते हो। मन धिक्कार नहीं देता। एक हूक नहीं उठती कि अपनी ही पीठ पर खंजर मार लिया। अपनी ही नस काट ली। ऐसे कैसे यार।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें