कल्पनाशब्दों के बीच
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उस पल तुझ में प्रेम बीज देखा और कल्पना की प्रणय छांव की ...…

उस पल तुझ में प्रेम बीज देखा और कल्पना की प्रणय छांव की .... मैं डूब गई। तुम सही कहते हो जिंदगी अपनी ढब से चलती है। चलने दो। तुमको दरख़्त बनते देख रही हूं.... उदास पर उम्मीद से भरी जिस रोज़ चार मौसम , तीन पहर,दो पल और एक तारीख की canopy बनेगी .... मैं मुस्कुरा दूंगी। मेरा intuition कहता है.... Divine time भी कुछ होता है। मानो कहा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें