भाषा / Language
हम अपने अकेलेपन को जितना कुरेदते जाते हैं खुद को उतना पाते…
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हम अपने अकेलेपन को जितना कुरेदते जाते हैं खुद को उतना पाते जाते हैं। मैं इसे स्पिरिचुअल हीलिंग की तरह पाती हूं। अकेलेपन की पहली परत पर हमें ढेर सारे चेहरे दिखते हैंI
इनमें अपने को खोजने में हम अपनी सी किसी पसंदीदा रूह से टकरा जाते हैं।
उस रूह को चाहने में अकेलापन प्रिय होता जाता है। हम एकांत बनाते हैं। अपनी दूसरी परत पर उंगली रखते हैं।
उसके बेहद प्रिय हो जाने पर याद आता है कि दूसरे को चाहते चाहते हम अपनी ही चाहना को खनखनाते रहे हैं। हम खुद को सींचते रहे हैं। होना मायने रह जाता है। अपना core बस इसी पल छू पाते हैं।
प्रेम बीज पड़ने का नहीं फिर फिर बीज होते रहने का काम है।
वयम में स्वयं का मिलना एकांत है।
*पहाड़ों को देखते हुए आया ख्याल
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें