भाषा / Language
अपने ही दुख को रेशा रेशा अलग करना और फिर उसे गूंथ कर खुद का…
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अपने ही दुख को रेशा रेशा अलग करना और फिर उसे गूंथ कर खुद का श्रृंगार कर लेना ही औरत हो जाना है।
रो पड़ने के लिए आँसू नहीं....
ढ़ेर सारा मन चाहिए
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें