भाषा / Language
हमको लोगों से मिलने का कब शौक था
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हमको लोगों से मिलने का कब शौक था,
महफिलाराई का कब हमें जौक था
आपके वास्ते हमने ये भी किया,
मिलने जुलने लगे, आने जाने लगे
*सुबह से मिलनी हुई
नीमबाज आँखें धर दी उसकी हथेली पर
बोसा रूह को मिला है
महक गालों पर है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें