ककल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 3724

भाषा / Language

हमको लोगों से मिलने का कब शौक था

✦
हमको लोगों से मिलने का कब शौक था, महफिलाराई का कब हमें जौक था आपके वास्ते हमने ये भी किया, मिलने जुलने लगे, आने जाने लगे *सुबह से मिलनी हुई नीमबाज आँखें धर दी उसकी हथेली पर बोसा रूह को मिला है महक गालों पर है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें