कल्पनाशब्दों के बीच
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वो जगह यकीनन बेहद सुंदर होगी जहाँ तुम मेरे हिस्से की चुप औ…

वो जगह यकीनन बेहद सुंदर होगी जहाँ तुम मेरे हिस्से की चुप और मैं तुम्हारे हिस्से की उदासी एक साथ रख आते हैं। उस जगह पर अब फूल नहीं चिट्ठियां खिलती हैं। अदृश्य चिट्ठियां..... बेआवाज़ चिट्ठियां मन में चार खाने हैं। पहले कहीं भी कुछ भी रख देती थी। जब जी आया कह देती थी तुमसे। अब एक फोल्डर बना लिया है मैंने। कहना .......खो देना होता है।ज़ाया हो जाना। अब न कहूँगी। उस में लिखूँगी जो जी चाहे।जो उस पल कहना चाहा और कह न सके। न कह पाने का दुःख अब कम है। बेचैनी काबू में है। बे पता बेरंग चिट्ठियां मुझे बेपनाह रखती हैं।इन से इत्र गिरता है। मन अब मरता नहीं। बेपंख हूँ पर उड़ान अभी भी बाकी है।तुम तक रोज़ आऊंगी। * दिल बहला ले जाना था। ले गयी। तुमसे क्या माँगा ....जो अब माँगूँगी। कभी मिलोगे तो इन बेरंग चिठ्ठियों की गंध से पहचान लेना मुझे। किसी पर तुम्हारा नाम न होगा।पर सबमें आवाज़ होगी मेरी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें