कल्पनाशब्दों के बीच
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क्या जिद्द पाले बैठे हो .....देव

क्या जिद्द पाले बैठे हो .....देव सम्भलो .....रुको तो सही मत बांधो एहसासों के पाँव में शब्दों के घुंघरू ये बेरब्त हुए जा रहे है थम जाओ ..... समझ जाओ.... ये आसक्त हुए जा रहे हैं जख्मी कर देंगे ये खनक कर ऐसे ही यहाँ वहाँ भटक कर सुनो ...... मान भी जाओ ..... बंद करो ये शोर एहसासों का ये वक़्त नहीं ऐसी बातों का दर्पण उठाओ ....... देखो तो सही जो अंतस में तुम्हारे मैं वो रत्ती भर भी नहीं अब बस भी करो ..... चुप हो जाओ अर्ज़ सुन लो ...... जानते हो न मुझे मौन की आदत है यही बस ....यही कर जाओ ....... बस ऐसे ही सिमट जाओ ...... मेरी चुप से लिपट जाओ ......देव
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें