भाषा / Language
मेरे जाते ही तुम सूख जाओगे
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मेरे जाते ही तुम सूख जाओगे...
जानती थी
तभी अमरबेल कहती थी खुद को।
रहूंगी सदा ...कहती थी।
एक रोज़ भ्रम औंधे मुंह गिरा।
बेशक ये मेरी टूट थी
पर चटक तुमको मुबारक।
मेरी चोट का निशान साबुत रहे।
ख्वाइश है।
तुझ उदास पेड़ पर रोज़ नई चिड़िया तो आए पर नई कोंपल कभी न आए।
मेरा वसंत तुम पर उधार रहा।
तुम हर स्पर्श को भूल जाओ।
जिसे छू लो वो सोने का हो जाए।
पीला पर प्रेमहीन।
विदा
हरे रहना।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें