भाषा / Language
तस्वीर मेरा मन कभी नहीं दिखा सकती ,ना मेरे मनके,ना ही मेरे…
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तस्वीर मेरा मन कभी नहीं दिखा सकती ,ना मेरे मनके,ना ही मेरे मन का
वो हक़ बस मेरे लिखे को है।
ये जान कर हंसी आती है कि लोग तस्वीरों को पढ़ने की कच्ची कोशिश करते हैं ।judge करते हैं।
जानते हैं ..
हर पल इंसान का मन करवट लेता है ।हर इंसान में कई सौ ज्वार उठते गिरते हैं। सबके हिस्से अलग अलग उठापटक । सबके अपने दुःख हैं। अपनी जद्दोजेहद।
कौन है जो खुश है? कौन है जो खुश नहीं यहां?
कौन कितनी खुशी में खुश हो सकता है ?कौन कितनी खुशी में दुखी? किसके दुख की सीमा कितनी हैं?किसमें कितने सुख सोखने की क्षमता है? कौन किस बात पर रो जाता है ?कौन किस दुःख को गला ले जाता है?किसके दुःख का क्या भार है ?क्या सबब है? कितनी मियाद है? कितनी मार?
बताओ बता सकती है तस्वीर?
तस्वीर को अधिकार है बस दिखने का
होने का नहीं। होना हमें ही पड़ता है।
बिना महक की मिट्टी होती हैं तस्वीरें
बिना खुशबू का फूल
बेफिजूल
हमको तमगा लगाने की बुरी आदत है । हमको खुश रहना सीखना चाहिए। हम दूसरों को किस हक से अच्छा बुरा कहते हैं?
हम क्या जानते हैं किसी के बारे में।
तस्वीर बस मुस्कुरा सकती है... खुश मन को होना होता है।
जो ये नहीं कर पाते और वही कोई दूसरा कर ले तो एक अभाव एक कमतरी महसूस होती है ।इस कमतरी में अक्सर लोग खुद को ऊपर की तरफ और दूसरों को नीचे की तरफ धकेलते हैं। नीचे भरी भारी चीज़ें ही जाती हैं । इस क्रम में ये कमतर लोग कई नामों विशेषणों का अविष्कार करते हैं ।कूड़े से पाटा जाता है अंतर।
तस्वीर से नहीं तस्वीर वालों से मिला कीजिए। मिलान कीजिए.... फिर तमगा पहनाइए।
जश्न मनाने के अपने तरीके हैं। दर्ज़ करने के अपने।तस्वीर फकत होना है उस पल का।
जश्न और सुकून खुद होने से ही होते हैं।
आपका होना तस्वीर तय नहीं करती ।
तस्वीर को नहीं ...तस्वीर वालों को परखिए।
*पोस्ट उन दुखी आत्माओं के लिए लिखी है जो इन तस्वीरों से ऊबे जाते हैं ।खब्त लिखने की है तस्वीर तो बस इक खूंटी है।
आंखें दुख रहीं होती तो कुछ कर भी सकती थी।आपका तो मन दुख रहा। मैं क्या कर सकती हूं?
अनफॉलो ...अनफ्रेंड कीजिए बिंदास।
तस्वीर को क्या ताना देना।
वो तो रहेगी
बेसबब
बेवजह
बेहिसाब
बेखौफ
मेरे मन की तरह
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें