कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 3629

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मैं उस कगार पर हूँ जहां से लौटना संभव नहीं...नाव टूटेगी या…

मैं उस कगार पर हूँ जहां से लौटना संभव नहीं...नाव टूटेगी या डूबेगी वापसी के सारे रास्तों पर रेत भर आई हूँ। मुड़ कर देखूँ तो ... पीछे मैं नहीं दिखती और आगे तुम ही तुम तुम में उतर कर ही पार लगूँगी समर्पण अपनी लहरों को मेरा घर बनने दो स्पर्श की दरकार नहीं मुझे प्रेम्बन्ध दो ... अपना ख़ाली मन दे दो मुझे मैं इसमें अपनी थकान अपनी यात्रा रख दूँ।तुम हँस सको कुछ देर। तुमको नकारना मेरे बस की बात नहीं। सुनो! तुम मुझे अपने में रद्द कर दो थामे रहो ! लौटना निहित हो नहीं सकता मेरा कि मैंने अपना उद्गम, संगम और विलय तुम्हारे नाम लिख दिया है अब मेरा कोई नाम ....कोई पता नहीं मैं किधर जाऊंगी? मैं क्यूँ जाऊंगी?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें