भाषा / Language
किसी रोज़ सलीके से छोड़ देना
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*किसी रोज़ सलीके से छोड़ देना...
ये बार बार का आख़री लौटना दुखता है बहुत
*दिल के घर में खिड़कियां कभी रखी ही नहीं .....
जाने के साथ ...उड़ जाने वाला डर क्यूँ पालती ?
*एक रोज़ मिलेंगे तुमसे तो तारे बस साथ देखेंगे....
गिने तो अक्सर हैं तन्हाई में
*एक रोज़ चुप्पी को चुप के साथ रख कर भूल गयी ।
तुम बन गए
*सारी शरारतें संभाल कर रखी हैं....
सिर्फ़ तुम्हारे लिए
*उदासी वाली लालटेन लाना....
प्रेम से टूट कर फूल काँटों से मिल गए हैं।
बीन लूँ
*एक रोज़ उस तरफ से जाकर देखेंगे कि इस तरफ हम तुमको कैसे लगते हैं ?
*मेरी शिफ़ा बस तुम्हारी आँखों के पास है....
बस देखते रहा कीजिये
मुझे।
💐दिन हर पल याद से बनता है। पल लिखती रहती हूँ। दिन गुज़रते जाते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें