कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 3610

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खुद के भीतर उतरना चाहती हूं

खुद के भीतर उतरना चाहती हूं.... साथ उड़ोगे क्या ? *हम अपनी सीमा के पार जाते ही तब हैं जब पीछे छूटने को और आगे लूटने को कुछ न बचा हो। हम खुद अपने पर काट कर ही उड़ते हैं... *उदासी .......सबसे बड़ी ज़िद्द है। मुझे तो लगती है .....खूबसूरत सी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें