कल्पनाशब्दों के बीच
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मुस्कुरा दो

मुस्कुरा दो.... बस यही हमारे दुःख की काट है। जैसे हम अपनी मर्ज़ी से ही कहीं मन रखते हैं वैसे ही मन को उदासी से उठाकर कहीं और रखना भी एक हुनर है। मुझे *शायद * शब्द हमेशा से नापसंद है। मैं ज़द बढ़ा सकती हूँ।वही करूँगी। सोच का ही खेल रहता है हमेशा। जो चाहते हो ....बस वही सोचिए ....वही होगा ऐसा होता है.... यकीनन एक बात और मन में यकीन के बादल बने रहने दें तभी आसमान में भी कील ठोक सकते हो। मन बचाओ तो सही... एक बार मुस्कुराओ तो सही😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें