भाषा / Language
रात ने मेरे लिए अपने उजाले कितने कम कर दिए हैं।
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रात ने मेरे लिए अपने उजाले कितने कम कर दिए हैं।
मैं चाँद थोड़े ही हूँ।
रात की विनम्रता भर हूँ।
तुमने मन रखा पर मन में नहीं रखा...
फिर सोचती हूं ...मन रखने वाले मन रखते कहां हैं।
*इंतजार करती हुई स्त्री सुंदर होती जाती है और पुरुष उतना ही बेचैन।
मुझे दोनों का फख्र हासिल है।
तस्वीर मेरी बस अभी की है। इंतजार तुम्हारा ।
बेचैनी कितनी सुंदर है कोई न कोई बता ही देगा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें