कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 3556

भाषा / Language

मुझमें मेरे ही कई टुकड़े साथ चलते हैं ।

मुझमें मेरे ही कई टुकड़े साथ चलते हैं । तुम उनमें से सबसे ज्यादा जगह घेरते हो। प्रेम की दुनिया बड़े हो जाने से नहीं चलती... बड़े मन से चलती है। मैंने प्रेम में तुम्हारे लिए मन बड़ा कर लिया है। होने में ....न होने में भी बस तुम होते ही हो। मन में तुम्हारे जाले हैं। मैं खुद बनाती हूं तो निकलने का प्रश्न बेकार है। तुमसे क्या मांग सकूंगी एक नज़र भर झलक के अलावा .... मिल जाए तो रब ना भी मिले तो भी सबब ईश्वर ने मुझे मेरा मन कातने का हुस्न बक्शा है। मेरे एकांत को सजाना जानती हूं मैं। लिख कर प्रेम जताती नहीं। करती हूं प्रेम । तुमसे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें