भाषा / Language
जो बात ख़्वाह-मख़ा होने में है वो कहीं और है भी नहीं।
✦
जो बात ख़्वाह-मख़ा होने में है वो कहीं और है भी नहीं।
कुछ इश्क फिजूल होते हैं ।
इक चेहरे की इबादत में लगे लगे रब्ब सा सुकून पाते हैं।
आब को नकार देते हैं प्यास को पुकार देते हैं।
तुमको तलब रखेंगे।
यही गुनाह हम पर फबता है ।
यही सज़ा तुम्हारी मुकर्रर है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें