कल्पनाशब्दों के बीच
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जो बात ख़्वाह-मख़ा होने में है वो कहीं और है भी नहीं।

जो बात ख़्वाह-मख़ा होने में है वो कहीं और है भी नहीं। कुछ इश्क फिजूल होते हैं । इक चेहरे की इबादत में लगे लगे रब्ब सा सुकून पाते हैं। आब को नकार देते हैं प्यास को पुकार देते हैं। तुमको तलब रखेंगे। यही गुनाह हम पर फबता है । यही सज़ा तुम्हारी मुकर्रर है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें