भाषा / Language
जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो
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जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो...
जाने किस मिट्टी के थे पुराने प्रेमी
उनकी नज्में
उनके नगमे
अभी यही सुन रही वॉक करते हुए। चलते चलते लिख रही।
चल नहीं रही... एक श्वेत श्याम era में झूम रही।
दो अक्स मेरे सामने डूब रहे।
हर शब्द के बाद एक विराम महसूस होता है।
लगता है जब तक पिछले शब्द का अर्क निचुडेगा नहीं अगला उगेगा नहीं।
कितना सब्र
कितनी थाम
कितनी लय
कितना वक्त हर कशिश को उभार लाने के लिए।
हर हरकत इक नई नजाकत लिए हुए।
एक पूरा वाक्य एक दृश्य सा
हर विराम में बरबस ही बेहिसाब लरजिश
एक धक्क बेवजह
हिंदी और उर्दू के लफ्ज़ों का जम जम का प्याला
सुरूर और नूर से भरा
पंखुड़ी में पंखुड़ी पिरोया हुआ सा असर ।
एक कली एक पत्ते के बीच अनदेखा गुरुत्वाकर्षण
बस इस पल मर जाने की बेचैनी
एक अजब चाहना
एक अनपढ़ हैरानी
कोई कितना हद ठहर जाता था सिर्फ़ ये कह देने के लिए कि तुमसे मुहब्बत है।
बस तुमसे।
चौदहवी का चांद हो।
*आज के गीत सुनती हूं तो लगता है
पहले अंतरे तक तो खंबे गिर गए।तंबू उड़ गया। पत्तल हवा में तैर रहे...
प्रेम अपने में और प्रेमी अपने अपने में धुत्त हो चुके।
बिना हरारत
बिना झोंके के।
शुभ रात
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें