कल्पनाशब्दों के बीच
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तुम रेत में उगे

तुम रेत में उगे मैं पहाड़ पर हुई फ़िर ऐसा क्यूँ है कि तुम सर्द आगोश को ढूंढते हो और मैं हथेलियों की गर्माइश कुछ प्रश्न उत्तर के साथ नहीं आते कुछ उत्तरों के प्रश्न ही नहीं बने साँझा ख़्वाब देखोगे? क्या पता तुम मेरा कोसापन चुरा लो और मैं तुम्हारा सारा बंजारापन सोख लूँ। क्या पता हम एक ही उजास लिखें अनंत तक... किसी रोज़ इंतज़ार है। मुझे तुमसे मुहब्बत है...मगर मैं कह नहीं सकती। मगर मैं क्या करूं बोले बिना भी रह नहीं सकती। *योगा कर रही। अभी इस वक्त ये सुन रही.. रफ़ी साहब...लव यू
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें