कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 3517

भाषा / Language

इश्क़ बून्द से रहा तो समुंदर पर नज़र पड़ी ही नहीं

इश्क़ बून्द से रहा तो समुंदर पर नज़र पड़ी ही नहीं मेरे अपने किस्म का किस्म है। तिलस्म है। कैसे कह दूँ तल्ख़ है ज़िन्दगी ? चुटकी भर तो बस उसके मुस्कुराते ही चली आती है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें