भाषा / Language
इश्क़ बून्द से रहा तो समुंदर पर नज़र पड़ी ही नहीं
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इश्क़ बून्द से रहा तो समुंदर पर नज़र पड़ी ही नहीं
मेरे अपने किस्म का किस्म है।
तिलस्म है।
कैसे कह दूँ तल्ख़ है ज़िन्दगी ?
चुटकी भर तो बस उसके मुस्कुराते ही चली आती है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें