भाषा / Language
तुमने न उम्मीद दी
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तुमने न उम्मीद दी ...
न मुक्ति
मेरे इश्क का यही हिस्सा मेरा है।
तुझे कैसे पता न चला ...
*तस्वीर मेरी पसंद की है। बर्फ़ में बर्फ़ होने जैसी।
शाम के इस पल अपने साथ हूं। असीस कौर गा रहीं...
मैं मुस्कुरा रही।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें