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रचना 3510

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तुमने न उम्मीद दी

तुमने न उम्मीद दी ... न मुक्ति मेरे इश्क का यही हिस्सा मेरा है। तुझे कैसे पता न चला ... *तस्वीर मेरी पसंद की है। बर्फ़ में बर्फ़ होने जैसी। शाम के इस पल अपने साथ हूं। असीस कौर गा रहीं... मैं मुस्कुरा रही।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें