कल्पनाशब्दों के बीच
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इतना भर तस्कीन रहा कि ज़िन्दगी ना सही बेहिसाब हर्फ़ भरे जा सक…

इतना भर तस्कीन रहा कि ज़िन्दगी ना सही बेहिसाब हर्फ़ भरे जा सकेंगे तुम्हारे नाम के। मिल्कियत मुबारक तुम्हें । * तस्वीरें अभी walk करते वक्त ली है। आंखों के साथ होंठों की हंसी मिलान कर के देख रही थी। जोड़े मिल नहीं रहे। जैसे शाम उतरती है मन भी उतर जाता है। आ जाओ कहां हो तुम?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें