भाषा / Language
अगर मेरे शब्द चुभते हैं
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अगर मेरे शब्द चुभते हैं.....
तो मेरी इस किताब को जला दो
मैं भी ठीक यही करती हूँ
कुछ चुभता है तो ....
अपने शब्दों का लोभान खुद पर छिड़क कर राख हो जाती हूं।
जला कागज़ पेश कर देती हूँ
आपकी नज़र कर देती हूँ
मैं लिखती रहती हूँ
अपने जंगल के जंगली फ़ूल बिखेरती रहती हूँ ...
थक जाने तक
ठूंठ हो जाने तक
आग शांत हो जाने तक।
शुभ रात
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें