कल्पनाशब्दों के बीच
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अब तलक जितना तुम्हें

अब तलक जितना तुम्हें... कहा गया और.......अनकहा भी लिखा गया और..... अनलिखा भी देखा गया और....... अनदेखा भी बूझा गया और ........अनबूझा भी छुआ गया और .......अनछुआ भी जाना गया और...... अनजाना भी सब मेरा है और इतना ही और तुम्हारा मेरे लिए होना बाक़ी है । 😊😊😊😊😊😊 हाँ में "नहीं" होकर नहीं में "हाँ" होकर मैंने बचाए रखा है प्रेम दरक जाना भी प्रीत है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें