भाषा / Language
किसी किसी रोज़ शब्दों पर फफोले नहीं पड़ते मेरे
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किसी किसी रोज़ शब्दों पर फफोले नहीं पड़ते मेरे ...
उस दिन कविता नहीं लिखी जाती मुझ से।
जैसे आज....
मन रेत है
और उंगलियां बर्फ़ सी सुन्न
एक शोर है जो अति घोर है।
शुभ रात
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें