भाषा / Language
आज शाम अल्मोड़ा किताब घर गई थी इस उम्मीद में कि लप्पुझन्ना…
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आज शाम अल्मोड़ा किताब घर गई थी इस उम्मीद में कि लप्पुझन्ना मिल जायेगी।पर पता चला किताब आते आते ही बिक गई। आज किताब घर वाले दाज्यु को एडवांस पैसे और फोन नंबर देकर आई हूं कि अगली खेप आते ही मेरी अलग से रख देना।
किताब घर में करीब आधा घंटा रुकी। खूब सारी किताबों को निहारा। दो दोस्त भी मिल गए। विजयश्री और किशोर जी
अपने लिए दो किताबें लाई । एक कुमाऊनी कविता संग्रह आमक बगस यानी दादी का बक्सा और दूसरी कुमाऊं का इतिहास । पढ़ कर मन सांझा करूंगी। एक किताब दक्षु के लिए भी ली।
किताब के साथ दिया जाने वाला कागज का कवर भी बेहद मनमोहक है। तस्वीर सांझा कर रही।
कवर पर पांच लाइन की कविता छपी है। उसमें अपना नाम देख कर मुस्कुरा उठी।
किताबें हों और कल्पना ना हो
ऐसा हो ही नहीं सकता।
कवर के पीछे कुमाऊं के प्रसिद्ध कवि गिर्दा जी की कविता छपी है।
उसका अर्थ समझ कर सांझा करूंगी।
दो तीन दिन की बीमारी के बाद अब थोड़ा ठीक भी लग रहा। किताबें भी मिल ही रही यहां। और क्या चाहिए।
आप सब ख्याल रखिए।
शुभ रात
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें