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अल्मोड़ा की बाजार में कोई गुम नहीं हो सकता। कारण साफ है एक…
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अल्मोड़ा की बाजार में कोई गुम नहीं हो सकता। कारण साफ है एक तो ये सीधे सीधे ऊपर से नीचे ... नीचे से ऊपर जाती हुई बाज़ार है। दूसरा कारण यहां पर एक ऐसा माइलस्टोन है जिसे अल्मोड़ा का बच्चा ,बूढ़ा ,जवान, युगल प्रेमी ,दोस्त, यार ,पहाड़ी नार सब पहचानते हैं।वो है बाज़ार में एक कोने में चुपचाप खड़ा लोहे का शेर। खोया पाया लोगों का,इंतजार करते लोगों का,फोन में घुसे प्रेमी प्रेमियों का मिलन प्वाइंट।
आसपास बाज़ार लगा रहता है ।दिनभर हो हल्ला...चहल पहल।जाने कितने लोग इस शेर के पास से गुजर जाते हैं ।शेर चुपचाप बरसों से यहीं खड़ा है।
इसके आसपास कई छोटे छोटे होटल हैं। सुमंगलम ,जलेबी की बरसों पुरानी बेहद प्रसिद्ध दुकान,और भी दो तीन छोटे छोटे जलपान गृह।
बस वहीं पांच सीढ़ी उतर कर मेरी पसंदीदा अशोका रेस्टोरेंट है। छोटा सा...बेहद सादा पर ठीक ठाक साफ सुथरा।
गिन कर ६टेबल लग पाते होंगे इतनी सी जगह पर।
पसंदीदा इस लिए कि शादी के बाद जब पहली बार बाजार घूमने आई तो यहीं चाट खाई थी विनोद के साथ। मुझे लगा क्या ही जगह खिलाने लाए हैं ये। पर जब खाया तो मन तृप्त हो गया।
तब से इसका नाम मैंने *कत्तई रोमांटिक प्वाइंट* रख दिया है।जब भी अल्मोड़ा आती हूं बस हम दोनों यहीं की चाट समोसे हलवा खाते और कॉफी पीते हैं। चमक धमक से परे।बस स्वाद ही स्वाद। भव्या दक्ष को भी ये अनुपम जगह दिखाई है मैंने कि तेरे पापा मुझे डेट पर यहां लाए थे। भव्या बोली .... सही है । रिवाज़ कायम रखेगा दक्ष।
बहू रानी को यही लायेगा।
आज फिर बाज़ार गए तो विनोद बोले कहीं और चल लो क्या उधर ही पहुंच जाती हो। मैं नहीं खाऊंगा। तुम खा लेना।
मैं हंस कर सीढ़ी उतर गई। टिकिया ऑर्डर की। तब तक सोचा दुकान के मालिक श्री भुवन लाल साह जी को तो बता दूं कि ये आपकी दुकान हमारे लिए स्पेशल है।कितने साल गुजर गए। हम यहीं आते हैं। बातों बातों में उन्होंने बताया कि ये छोटी सी दुकान १९६२ से है। उनके पिता स्व.उदय लाल साह जी इसे चलाते थे। अब मैं चलाता हूं। कभी कभी मेरा बेटा भी देख लेता है। ठीक ठाक गुजर बसर हो रही। आप इतने सालों से आ रहीं ।आप जैसे बहुत लोग आते रहते हैं। बस और क्या चाहिए। समोसे,चाट, गाजर हलवा,थुपका,chowmein, बन टिक्की,और भी बहुत कुछ खाया जा सकता है इस छोटी सी जगह पर।
मैंने कहा ...हां २३साल से तो हम ही आ रहे। जब भी बाज़ार आते हैं इधर आते ही हैं।मैं २३सालों से आपकी टिक्की और कॉफी पर अटकी हूं।
आपकी दुकान वैसे की वैसी ही है। स्वाद से आबाद।
उन्होंने मुझे और विनोद को धन्यवाद कहा।और मुस्कुराकर हाथ हिलाकर बाय कहा।
*तस्वीर उनसे पूछ कर ली है ये कह कर कि मुझे अपना* कत्तई रूमानी प्वाइंट* सब को दिखाना है।fb पर पोस्ट करूंगी।अशोका की पब्लिसिटी भी हो जानी है।
सबसे जरूरी बात.... न खाने वाले विनोद भी एक प्लेट टिक्की साफ़ कर आए हैं। ।
मुझसे प्रेम जो ठेरा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें