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आज फिर आसमान कम

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आज फिर आसमान कम मन परिंदा ज्यादा है काश आज तुम कह पाते कल्पना क्या इरादा है? कुछ तारीखें बस कैलेंडर में आती हैं...हमारे हिस्से में नहीं आती। वो मेरा ख़ामख़्वाह है.... इससे ज्यादा इश्क़ क्या होगा? *सुबह से यहां बारिश है। टैक्सी दिल्ली से पहाड़ों की ओर दौड़ रही।मैं हेडफोन पर यह गीत लगाए जाने कहां हूं ।किसके पास हूं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें