भाषा / Language
एक हद के बाद
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एक हद के बाद
हम अपनी सहूलियत के लिए दुख से भी सुख सोखने लगते हैं।
ज़िन्दगी मांगती कब है ?
बस चाहती जाती है...
बेपनाह
* तस्वीर पुरानी है पर मन में उदासी आज फिर नई है।
वजह तुम हो।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें