कल्पनाशब्दों के बीच
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किसी किसी रोज़ इतनी उदासी छा जाती है कि लगता है दिन भर की थ…

किसी किसी रोज़ इतनी उदासी छा जाती है कि लगता है दिन भर की थकान भी देह से उदासी की पपड़ी बन कर झड़ रही। दिन को तो काम से खूबसूरत बनाया जा सकता है पर जब दिन गुजार कर खुद तक लौट कर आओ तो लगता है क्या किया खुद के लिए। मन का क्या किया खुद के लिए? इक पल वो किया जो मन के पांचवे खाने में लिख छोड़ा है? इससे बड़ी उदासी क्या होती है जब मन हामी भरे कि कुछ न किया तुमने कल्पना ... उस पांचवे खाने के लिए। सो जा । कल इक नई सुबह आए नई लौ जगे मन की । पांचवां खाना मन का आबाद रहे। शुभ रात
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें