ककल्पनाशब्दों के बीच
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कई बार देखने पर ज्यादा नहीं दिखता

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कई बार देखने पर ज्यादा नहीं दिखता बल्कि वह दिख जाता है जो पिछली बार अनछुआ अनदेखा रह गया था। तुम मुझे बार बार देखना मैं बेतरतीब सी हूँ । ठीक कहते हो तुम ....मैं शब्दों से प्रेम पासे फेंकती हूँ। देखो तो .....जीते क्या तुम? बाजीगर
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें