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रोज़ इंतज़ार के साथ ज़रा ज़रा मैं भी आती हूँ। जिस रोज़ लगे सिर्फ़…

रोज़ इंतज़ार के साथ ज़रा ज़रा मैं भी आती हूँ। जिस रोज़ लगे सिर्फ़ मैं आ गयी उस रोज़ तक देखते रहना । इंतज़ार संग निबाहने वाली शै है। अकेले में यह घोर दुःख लगता है ।दो आपसी इंतज़ार जैसा सुख क्या होगा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें