कल्पनाशब्दों के बीच
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जब कहीं नहीं जा पाती हूँ

जब कहीं नहीं जा पाती हूँ .... तो खुद में बहुत दूर निकल जाती हूँ मलहम ना भी मिले मखमल तो मिल ही जाता है अपने आप को....अपने आप में अभी अभी अजनबी हुआ हुआ "मैं" ..... इक बार फिर सुर्ख गुलाब देकर जाने कितनी बार I love u बोलता जाता है .... मुझे मनाता जाता है। और मैं बाँवरी ....I am sorry सुन रही होती हूँ ... इसलिए लौटा लाती हूँ खुद को वापस वहीँ ...... जहाँ से फिर न जाने कितनी बार कितने ही रोज़ के लिए कहीं नहीं जा पाना तय हो जाता है मेरा ऐसा कहती हर लड़की जादुई है.... मैं भी .. 😊😊😊😊 *ये मेरे अल्मोड़ा में सड़क से नीचे पैंया के पेड़ों में बहार आ गई है। मैं और तुम मिल कर गुलाबी ठंड में गुलाबी हो गए 😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें