कल्पनाशब्दों के बीच
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दो आँखें भी कहाँ एक जितना देख पाती हैं।

दो आँखें भी कहाँ एक जितना देख पाती हैं। दो जोड़ा तो फिर एक जैसा क्या ही देखेंगी। वही मेरी हँसी किसी को जीवन किसी को उच्श्रृंखलता लगती है। वही मेरी उम्र किसी के लिए अवसर किसी के लिए पतझर है। वही मेरा तरीका किसी के लिए आत्म मुग्धा किसी के लिए आत्मा मुग्धा है । वही मेरा दुःख कभी मौन कभी कौन है वही मैं किसी को सृजन किसी को निर्जन लगती हूँ। वही मैं अच्छी हूँ और कभी सबसे कच्ची। कोई मुझे कल्पना कहता है कोई मुझे सिर्फ़ कल्पना । कोई क्या परिभाषित कर पायेगा मुझे जो अपनी नज़र अपना मन मेरे लिए नहीं रोक सकता। प्रयास व्यर्थ है। *किसी भी मैं को कोई दो तुम एक जैसा कम ही देख पाते हैं। खुद की नज़र भी धोखा दे देती है। आज का मैं प्यार कल वही ख़्वार हो सकती हूँ। आपको कोई नहीं पहचानता । आप खुद का पारस हो। सब बस हमारी पीठ पर विशेषण बांधने को तत्पर हैं वो भी अदल बदल कर अपने हिसाब से। इसी लिए कहती हूँ पैमाने ही नहीं.... पैमाने के पैमाने भी अलग अलग हैं। मगन रहिये खुद में कम देखिए😊 खुद को देखिए।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें