भाषा / Language
दुःख की लिपि नहीं बनी।
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दुःख की लिपि नहीं बनी।
इस अनुभूति को व्यक्ति, देश ,काल से कभी नहीं बांधा जा सका।
पर इसे हर भाषा ने रचा
दुःख किसी न किसी से ....कोई न कोई रूप का प्रेम ही है।
प्रेम हर भाषा में श्रेष्ठ कृति है
अगाध दुःख हर उस भाषा की श्रेष्ठतम रचना जिसमें प्रेम भरी कविताएँ कही,सुनी और लिखी गई।
प्रेम का विलोम भी दुःख और पर्याय भी 😊
आधी कटोरी में दोनों आधे आधे😊
चाँद पूरा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें